चंपत राय ने अपने 45 सालों के प्रचारक जीवन का हवाला दिया और खुद को एक खुली किताब बताया. उन्होंने लिखा कि मुझे अक्टूबर 1991 से अयोध्या में भेजा गया था. मेरा प्रचारक जीवन 45 वर्ष का है.

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