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भारत की गाथा में कई शताब्दियों से सभ्यतागत और सांस्कृतिक उत्कृष्टता समाहित रही है। हालांकि, औपनिवेशिक शासकों द्वारा देशवासियों में डाली गई हीनता की भावना स्वतंत्रता के बाद भी जारी रही और कई औपनिवेशिक प्रथाओं का महिमामंडन भी होता रहा। एक छोटा-सा अभिजात्य समुदाय बनाया गया, जिसने मैकॉले के विचारों और आदर्शों को कायम रखा। आजादी के बाद के दशकों में अंग्रेजी को शक्ति की भाषा के रूप में बढ़ावा दिया गया।
नेहरू युग और उसके तत्काल बाद के समय में भारत की अधिकांश चीजों को लेकर अभिजात्य वर्ग में शर्मिंदगी की भावना देखने को मिली। परंपराओं की जैविक निरंतरता और विकास की कमी के कारण आत्मविश्वास और नवाचार की कमी हुई।
पीएम मोदी ने भारतीय भाषाओं, प्रणालियों, प्रतीकों और विश्वास प्रणालियों को सामने रखा। इससे लोगों में भारतीय होने और उसे व्यक्त करने में गर्व की भावना दिखाई पड़ती है। कई देशों में भारतीय मूल के लोगों ने मेरे साथ गर्व की इस नई भावना को साझा किया।
नेहरू काल की विशेषता सांस्कृतिक और आर्थिक स्तर पर पश्चिम से मंजूरी और सहायता पाने की उत्सुकता थी। मोदी युग की विशेषता मजबूत घरेलू अर्थव्यवस्था में आत्मविश्वास है, जो गंभीर वैश्विक व्यवधानों का सामना करने में सक्षम है।
राजनीतिक विमर्श के क्षेत्र में, डॉ. अंबेडकर ने 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में अपने समापन भाषण में ऐतिहासिक वक्तव्य दिया था कि संसदीय लोकतंत्र के तत्व बौद्ध संस्थाओं में पाए जाते हैं, जो दो हजार पांच सौ साल पुराने हैं। उन बौद्ध संस्थाओं ने उस समय प्रचलित राजनीतिक संस्थाओं से लोकतांत्रिक प्रथाओं को अपनाया होगा। हमारे छात्रों और न्यायविदों को यह विश्वास कराया गया कि हमारा लोकतंत्र पश्चिमी देशों से लिया गया है।
पीएम मोदी वैश्विक मंचों पर कहते रहे हैं कि भारत लोकतंत्र की जननी है। विभिन्न अवसरों पर प्राचीन भारतीय लोकतांत्रिक लोकाचारों और प्रथाओं का उल्लेख किया है।
विश्व इस तथ्य के प्रति जागरूक हो रहा है कि भारत न केवल सबसे प्राचीन है, बल्कि सबसे बड़ा व सबसे जीवंत लोकतंत्र भी है।
Source: https://www.amarujala.com/india-news/former-president-ramnath-kovind-article-about-pm-modi-longest-serving-pm-2026-06-10