मोहन भागवत ने कहा कि समाज को मातृत्व के महत्व को केवल पारिवारिक भूमिका तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे मानवीय मूल्यों, संवेदनशीलता और सामाजिक संतुलन के आधार के रूप में देखना चाहिए. उनके अनुसार, परिवार और समाज दोनों की मजबूती में मातृत्व की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है.

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