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टीएमसी के सत्ता में आने की असल नींव तब पड़ी जब वामपंथी सरकार ने औद्योगिक परियोजनाओं को मंजूरी दी। इनमें सिंगूर में टाटा और नंदीग्राम में सलीम ग्रुप के लिए किसानों की कृषि भूमि का अधिग्रहण शुरू किया।

ममता बनर्जी ने विस्थापित हो रहे किसानों के समर्थन में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की और जमीन अधिग्रहण के खिलाफ सड़क पर उतरकर उग्र विरोध प्रदर्शन किया।

2007 में नंदीग्राम में विरोध कर रहे लोगों पर पुलिस की फायरिंग में 14 लोगों की मौत हो गई। इस घटना ने वामपंथी सरकार के खिलाफ जनता के गुस्से को भड़का दिया।

इन्हीं आंदोलनों के बीच टीएमसी को अपना सबसे लोकप्रिय नारा मां, माटी, मानुष मिला, जिसने पूरे बंगाल की जनता, खासकर महिलाओं और किसानों को पार्टी से गहराई से जोड़ दिया।

2009 के लोकसभा चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस ने फिर कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए के साथ गठबंधन किया और बंगाल में 26 सीटें जीतकर शानदार वापसी की। ममता बनर्जी को एक बार फिर रेल मंत्रालय सौंपा गया।

2010 में टीएमसी ने कोलकाता नगर निगम (केएमसी) चुनावों में 141 में से 97 सीटें जीतकर टीएमसी ने स्पष्ट कर दिया कि 2011 के विधानसभा चुनावों के लिए बंगाल में बदलाव की जमीन तैयार हो चुकी है।

आखिरकार 2011 के विधानसभा चुनावों में टीएमसी ने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और वाम दल के 34 वर्ष के शासन का अंत कर दिया।

इस चुनाव में टीएमसी गठबंधन ने 227 सीटें जीतीं, जिसमें से अकेले टीएमसी को 187 सीटें मिली। यानी टीएमसी अकेले ही पूर्ण बहुमत पर थी।

Source: https://www.amarujala.com/india-news/trinamool-congress-mamata-banerjee-tmc-story-of-breakaway-from-congress-1998-to-power-in-west-bengal-cpm-bjp-2026-06-08