कोर्ट ने कहा कि एक बार जब कोई व्यक्ति संसार का त्याग करके संत बन जाता है, तो वह अपने जैविक परिवार से अपने संबंध तोड़ लेता है. संन्यासी जीवन स्वीकार करने के बाद उसका अपने परिवार से हर मामले में पूरी तरह से अलगाव हो जाता है.
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