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स्काईरूट एयरोस्पेस शनिवार को श्रीहरिकोटा स्थित इसरो के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से भारत का पहला निजी निर्मित कक्षीय रॉकेट विक्रम-1 लॉन्च करेगा। यह रॉकेट भारतीय और विदेशी ग्राहकों के प्रौद्योगिकी प्रदर्शन पेलोड, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से हस्तलिखित 'वंदे मातरम' संदेश वाला एक पोस्टकार्ड, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और अंतरिक्ष यात्रियों के पोस्टकार्ड और एक सूक्ष्म कलाकृति पेलोड को पृथ्वी की निचली कक्षा में ले जाएगा।

जन्म कब हुआ? पवन कुमार चंदना, स्काईरूट सीईओ चंदना का जन्म 1991 में हैदराबाद तेलंगाना में हुआ था। इस तरह वे दुनिया के उन सबसे कम उम्र के संस्थापकों में से एक बन गए हैं, जिन्होंने एक कंपनी का नेतृत्व किया है जो कक्षीय रॉकेट प्रक्षेपण का प्रयास कर रही है।

कभी गणित से लगता था डर स्कूल चंदना के लिए अनुकूल नहीं था। एक बार गणित में उनके केवल 51 अंक आए थे। यही विषय आगे चलकर उनके पूरे करियर को परिभाषित करने वाला था। उनके पिता ने उन्हें निराश नहीं होने दिया। उन्हें आईआईटी प्रवेश परीक्षा के लिए कोचिंग में दाखिला दिलाया। उस कठिन परिश्रम के दौरान, संख्याओं का डर उनके प्रति आकर्षण में बदल गया।

पवन चंदना की कुल कमाई कितनी? मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पवन कुमार चंदना ने कभी भी सार्वजनिक रूप से अपनी निजी संपत्ति का खुलासा नहीं किया है। इसकी कोई सत्यापित जानकारी उपलब्ध नहीं है। जो बात ज्ञात है, वह है उनकी स्थापित कंपनी का मूल्य मई 2026 में 60 मिलियन डॉलर की फंडिंग जुटाने के बाद स्काईरूट एयरोस्पेस का मूल्य लगभग 1.1 बिलियन डॉलर था। यह फंडिंग राउंड शेरपालो वेंचर्स (जो गूगल के पहले बाहरी निवेशक राम श्रीराम की फर्म है) और सिंगापुर की जीआईसी के संयुक्त नेतृत्व में हुआ था। स्काईरूट के सह-संस्थापक होने के नाते, चंदना की संपत्ति इस मूल्यांकन से गहराई से जुड़ी हुई है। भले ही उनके नाम के साथ कोई आधिकारिक व्यक्तिगत संपत्ति का आंकड़ा न जुड़ा हो।

इसरो के वैज्ञानिक से स्टार्टअप के संस्थापक कैसे बने? 2012 में, चंदना ने कॉलेज से निकलते ही सीधे इसरो में नौकरी शुरू कर दी। वेतन मामूली था, लेकिन उन्हें काम इतना पसंद था कि उन्होंने अपना पूरा करियर वहीं बिताने का सपना देखा। तिरुवनंतपुरम स्थित विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र में लगभग छह वर्षों तक उन्होंने भारत के सबसे भारी प्रक्षेपण यान GSLV Mk-III, GSLV Mk-II के लिए S-200 सॉलिड बूस्टर पर काम किया। बाद में लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान के उप परियोजना प्रबंधक बने। 2016 में उन्हें एक आंतरिक नवाचार पुरस्कार भी मिला। लेकिन उनके मन में एक विचार लगातार बना रहा। भारत में एक निजी अंतरिक्ष कंपनी बनाना, ऐसे समय में जब कानून इसकी अनुमति भी नहीं देता था।

इसरो की नौकरी कब छोड़ी? चंदना ने 2018 में इसरो छोड़ दिया। उन्होंने एक स्थिर सरकारी नौकरी को त्याग दिया। वहीं, उनके पास कोई व्यावसायिक पृष्ठभूमि या निवेशकों से संपर्क नहीं था। उन्होंने लिंक्डइन पर मिंत्रा, क्योरफिट और नुआरएक्स के संस्थापक मुकेश बंसल को संदेश भेजा। आईआईटी खड़गपुर के सहपाठी बंसल ने जोखिम उठाया और 15 लाख डॉलर का निवेश किया। फिर महामारी आ गई, जिससे चंदना को सबसे ज्यादा जरूरत के समय ही आगे की फंडिंग रुक गई।

फिर बनी भारत की पहली निजी कंपनी नवीकरणीय ऊर्जा कंपनी ग्रीनको के संस्थापकों ने इस सपने को जीवित रखने का बीड़ा उठाया। जून 2018 में, चंदना और इसरो के सह-इंजीनियर नागा भरत डाका ने हैदराबाद में स्काईरूट एयरोस्पेस की सह-स्थापना की। दो साल बाद, जुलाई 2020 में, कंपनी ने रमन-1 का निर्माण और परीक्षण किया। नोबेल पुरस्कार विजेता सीवी रमन के नाम पर रॉकेट इंजन का परीक्षण करने वाली पहली निजी भारतीय कंपनी बन गई।

जब भारत ने 2021 में अपने अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोला, तो स्काईरूट सबसे पहले आगे आई। उसने इसरो के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए और 51 मिलियन डॉलर जुटाए, जो उस समय भारत का सबसे बड़ा डीप-टेक फंडिंग राउंड था। 18 नवंबर, 2022 को कंपनी ने विक्रम-एस लॉन्च किया, जो भारत का पहला निजी तौर पर निर्मित सबऑर्बिटल रॉकेट था, जिसने मिशन प्रारंभ के तहत 90 किलोमीटर की ऊंचाई हासिल की। बाद में पीएम मोदी ने स्काईरूट की नई विनिर्माण सुविधा का उद्घाटन किया। उस समय तक कंपनी में लगभग 1,000 कर्मचारी हो चुके थे और उसने देश की सबसे बड़ी निजी रॉकेट निर्माण इकाई स्थापित कर ली थी।

Source: https://www.amarujala.com/india-news/who-is-pawan-chandana-face-behind-skyroot-once-afraid-mathematics-founded-india-first-private-rocket-company-2026-07-18