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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ नौ-दिवसीय वार्षिक यात्रा पर अपनी मौसी के घर- गुंडिचा मंदिर जाते हैं।

कुछ धार्मिक ग्रंथों में गुंडिचा मंदिर को देवताओं का जन्मस्थान भी माना गया है। एक अन्य कथा यह भी कहती है कि तीनों भाई-बहन राजा इंद्रद्युम्न की रानी गुंडिचा से मिलने जाते हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने ही मंदिर की स्थापना की थी। भगवान वहां सात दिनों तक रुक कर अपनी मौसी के हाथों बने स्वादिष्ट व्यंजनों का आनंद लेते हैं।

इन रथों को हर साल बिल्कुल शुरुआत से नया बनाया जाता है। रथ निर्माण की प्रक्रिया यात्रा से लगभग दो-तीन महीने पहले अक्षय तृतीया से शुरू होती है और इसके लिए स्थानीय पेड़ों जैसे फासी, धौरा, सिमिली और असान की लकड़ियों का उपयोग किया जाता है।

लगभग 200 बढ़ई, चित्रकार और कारीगर हर दिन 12 घंटे काम करके इन्हें बनाते हैं। ये कारीगर पीढ़ियों से इसे वंशानुगत सेवा मानकर करते आ रहे हैं और किसी भी आधुनिक मशीन का उपयोग किए बिना अपने पूर्वजों से सीखी गई तकनीक का ही इस्तेमाल करते हैं।

हर रथ की ऊंचाई 40 फीट से ऊंची होती है, रंग, लकड़ी के घोड़े, रक्षक देवता और सारथी अलग-अलग होते हैं। सबसे ऊंचा और बड़ा रथ भगवान जगन्नाथ का होता है। इसके बाद भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा का रथ आता है।

श्रद्धालु इन रथों को खींचने के लिए नारियल के रेशों से बनी 250 फीट लंबी रस्सियों का इस्तेमाल करते हैं।

यात्रा समाप्त होने के बाद, इन रथों के कुछ हिस्सों (जैसे पहिए और धुरी) को मंदिर प्रशासन द्वारा बेच दिया जाता है।

जो लकड़ी बच जाती है उसका इस्तेमाल मंदिर की रसोई में ईंधन के रूप में किया जाता है।

Source: https://www.amarujala.com/india-news/jagannath-yatra-festival-of-chariots-know-beliefs-history-significance-and-readiness-for-this-year-puri-odisha-2026-07-16